दादी सास, रिश्ता कुछ खास 
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|   Jul 07, 2017
दादी सास, रिश्ता कुछ खास 

ससुराल में प्रवेश करने के बाद मेरी दादी सास से जो मेरा रिश्ता बना वो अविस्मरणीय है। मैंने उनके साथ हमेशा एक खास तरह का लगाव महसूस किया। उनको मैने जो आदर एक रिश्ते का सम्मान करते हुए दिया उन्होंने वापसी में उससे कई गुना ज्यादा प्यार और स्नेह मुझे दिया। उस प्यार की ताकत इतनी ज्यादा मज़बूत थी कि हम अपने रिश्ते से बहुत आगे निकल कर अच्छे दोस्त बन गए थे। वो बहुत ही मेहनती, सरल, शांत, मृदुभाषी तथा मिलनसार थी इस दोस्ती की शुरुआत शायद मेरे ससुराल में पहले दिन के साथ ही शुरू हो गई थी जब मैंने रसोईघर में सबके लिए हलवा बनाना था। मैं बहुत डरी-डरी थी क्योंकि इससे पहले मैंने कभी हलवा नही बनाया था। मेरी दादी सास ने सारा हलवा तैयार कर के मुझे सिर्फ कढ़ाई को हाथ लगाने के लिए बोल दिया तब मेरी जान में जान आ गई। उसके बाद ऐसे न जाने कितने पल थे जब मैं उन्हें हमेशा अपने साथ खड़ा पाती थी कभी कभी तो वो मेरे पति यानी अपने पोते के साथ भी मेरे लिए लड़ लेती थी हालांकि उनका अपने पोते के साथ अपार स्नेह था पर फिर भी वो मेरा पक्ष लेती थीं। उनकी खास बात यह थी कि वो थोड़े में ही बहुत खुश हो जाती थी। मुझे कई बार लगता था कि मैंने उनके लिए कुछ करके सिर्फ अपना प्यार जताया था या अपना फर्ज निभाया था लेकिन इसकी चर्चा वो दूर दूर तक अपने रिश्तेदारों में करती थी। ज़िन्दगी में कई बार ऐसे मौके आये जब मैं उनके रिश्तेदारों से मिली, तब उन्होंने मुझे बताया कि वो तुम्हारी और तुम्हारे मायके वालों की कितनी तारीफ करती है। मेरे लिए वो खुशी के पल होते थे। उस समय मै यह बात अक्सर सोचा  करती थी ज़िन्दगी में ऐसे लोग बहुत कम होते है जो थोड़े में भी खुश हो जाते है  कई बार तो पूरी पूरी ज़िंदगी निकल जाती है लोगो को खुश करने मे पर वो खुश तो क्या संतुष्ट भी नही होते। ऐसे लोग मौका मिलते ही कमियां ढूंढ लेते है I         

 मुझे अच्छे से याद है जब मेरी बेटी पैदा हुई तो उसको पालने की समस्या थी क्योंकि मैं और मेरी सास दोनो जॉब में थे, दूसरा उस समय क्रेच या डे केअर इतने ज्यादा प्रचलन में नही थे ऐसे समय मेरी दादी सास ने बेटी पालने की सारे ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली और इसे बखूबी निभाया भी। मेरे दादा ससुर भी उन्हें पूरा सहयोग देते थे। वो मेरी बेटी के सारे छोटे बड़े काम अच्छे से करती थी फिर भी उनके चेहरे पर शिकन तक नही आती थी। उन्होंने मेरी बेटी को कई अच्छी आदतें सिखाई। ये उनकी ही बदौलत था कि मेरी बेटी ने कभी खाना खाने में मुझे तंग नही किया।इस के अलावा घर के हर छोटे बड़े काम मे वो मुझे सहयोग देती थी। जब कभी घर में ज़्यादा काम होता था तो मैं जैसे ही काम निपटा कर उनके साथ बैठती थी तो उनका सिर्फ इतना कहना "आज तुम बड़ी थक गई होगी" मुझे भावुक कर देता था । ऐसा भी कितना बार होता था जब वो मुझे अपने हाथ का बना खाना खिलाती थी उस समय मुझे उनमें अपनी दादी की छवि दिखाई देती थी। 

समय अपनी रफ्तार से चलता रहाI अब मेरी बेटी भी बड़ी हो गई थी और हम दूसरे शहर में शिफ्ट हो गए मेरी दादी सास और दादा ससुर का हमारे घर आना जाना लगा रहता था। मेरे पति और मै उनके साथ घंटो बातें करते। वो हमारे साथ अपनी ज़िंदगी के खट्टे मीठे अनुभव शेयर करते। नए और पुराने ज़माने की बातों पर घण्टो चर्चा करते कब हमने इतने साल बिता दिए इनका पता ही नही चला।

उनसे इतनी निकटता होने के बाद उनकी जुदाई  के बारे में सोच कर भी डर लगता था और फिर एक दिन वो मनह���स घड़ी आ ही गई जब हमें पता चला कि दादी सास हॉस्पिटल में वेंटिलेटर पर है। ये दिल बार बार भगवान से ये प्रार्थना करने लगा कि भगवान उनको कुछ साल और हमारे साथ बिताने दो। जब मैं आखरी बार उनसे हॉस्पिटल में मिली और उनके पैर छुए तो मैने ये महसूस किया कि वो हाथ उठाने की कोशिश करके मुझे आशीर्वाद दे रही है लेकिन वो मुँह से कुछ कहना चाह कर भी कुछ कह नही पा रही थी। उनकी हालत देख कर मुझे यकीन हो गया था कि मेरा एक सच्चा और प्यारा मित्र मुझे हमेशा के लिए छोड़ कर जा रहा है और मै कुछ नही कर पा रही हूँ हमारे वो अनमोल पल अब सिर्फ यादो में ही रहने वाले है। मन फ़ूट फ़ूट कर रोने लगा। चंद लम्हो के बाद वो हमें हमेशा के लिये छोड कर चली गई। अपने पीछे छोड़ गई तो सिर्फ़ यादें, एक प्यारा रिश्ता और एक विश्वास कि वो कही आस पास ही है जो कि अपने आप मे बहुत खास था, जिसमें अपनेपन का एहसास था I

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