मायका, जहाँ लौट आता है मेरा बचपना
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|   Feb 25, 2017
मायका, जहाँ लौट आता है मेरा बचपना

मायके का मज़ा ही कुछ अलग है, स्पेशली जब खुद मा बन जाओ. मायका वो एक जगह है जहाँ हम खुद बच्चे बन जाते हैं.

पिछले हफ्ते जब मैं अपनी मम्मी के घर गयी तब मुझे एहसास हुआ के वाके में, मैं अपने बाबुल का देश नही भूली.

अपने बचपन और शादी से पहले बिताए हुए लम्हों की यादों ताज़ा हो जाती हैं कुछ इस तरह:

1. फोटो आलबम्स: जबही मैं मायके जाती हूँ, पुरानी फोटो आलबम्स लेके बैठ जाती हूँ. उन फोटोस को देखकर जो हसी मज़ाक होता हैं उसका मुकाबला कोई कॉमेडी फिल्म नही कर सकती.

2. दोस्त: मम्मी के घर पहॉंचने से पहले ही हमारे प्लॅन्स दोस्तों के साथ बन जाते हैं. किससे कहाँ और कब मिलना हैं, क्योंकि हमारे बच्चों की ज़िम्मेवारी उनकी नानी जो लेगी!

3. गुप-शप: मम्मी के साथ बैठ कर बातें करते करते टाइम ऐसे बीत जाता हैं के मानो हफ़्ता दस दिन भी कम लगते हैं. पूरी फॅमिली की हिस्टरी ताज़ा हो जाती हैं.

4. शॉपिंग: बचपन की मार्केट्स में घूमने और शॉपिंग करने में जो आनंद आता है वो किसी भी माल या शॉपिंग सेंटर में नही आ सकता. हैं ना?

5. खाना ख़ज़ाना: और शॉपिंग के बाद, हमारे खाने के पुराने अड्डों पर जा कर हमला करना बस अपने आप में एक अड्वेंचर है. इसके बिना मायके की ट्रिप अधूरी रह जाती हैं.

7. मम्मी के हाथ का खाना: दुनिया की कोई भी फाइव स्तर रेस्टुअरंट मम्मी के हाथ के खाने का मुकाबला नही कर सकती. वो मम्मी की फेवोवरिट वाली कढ़ी हो या मा के हाथ से बने गुलाब जामुन, ओवर ईटिंग तो बनता है बॉस!

6. सोना: और उसके बाद जो झम कर नींद आती है, लाजवाब. कभी नोटीस किया है की मम्मी के घर ही हम कुंभकरण की नींद ले पाते हैं.

मम्मी का घर मतलब समजलो जहाँ हमारा बचपन और बचपाना दोनो खिल उठता हैं, चाहे हम पचास साल के भी क्यों ना होज़ाये.

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