एक अफ़सोस
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|   Jun 03, 2017
एक अफ़सोस

 रणवीर कपूर की मूवी का एक dialouge .. ..मैं उड़ना चाहता हूँ.....दौड़ना चाहता हूँ...... पर रुकना नहीं चाहता ...को सुना तो अनायास एक पल को लगा की वाकई क्या ऐसा करना सही है ....क्यों हमें एक पल भी नहीं रुकना है ....यही तो कर रहे है हम सब आजकल..

लेकिन कभी कभी रुकने में भी सुकून है....कहते है ज़िन्दगी हर पल कुछ सिखाती है, पर किसके पास टाइम है की वह कुछ पल चुरा कर बैठ सके और अपना विश्लेषण कर सके. हमें तो बस एक मुकाबला करना है ...एक रेस का ,भागना है ,हर कोई हर किसी से आगे निकलना चाहता है.....हम दौड़ रहे हैं , तेजी से, अपनी सामर्थ्य से भी अधिक , पता भी नहीं कितना दूर जाना  हैं , फिर भी एक दुसरे को मात देते हुए दौड़े  जा रहे हैं, बिना यह सोचे , की पीछे क्या छूट रहा है  , बिना यह देखे की कौन है , अपना जो हमारा हर वक्त इंतज़ार कर रहा  हैँ   , सिर्फ कुछ समय बिताने  के लिए...... 

 मेरे साथ भी ऐसा कुछ हुआ जब मैंने अपनी माँ को खो दिया।  वह साथ न बिताये जाने का अफ़सोस आज भी दिल में हैं , हमारे घर में पापा , मै  और भाई सब  काम पर चले जाते थे, सिर्फ माँ के अलावा। हम सब पैसा कमाने की दौड़  में भूल गए की माँ घर पर अकेली  सिर्फ हम लोगो का इंतज़ार ही करती रहती हैं. क्यों मैंने इस दौड़ती -भागती  ज़िन्दगी को थोड़ा  सुकून  नहीं दिया ? क्यों वह पल जो हम साथ गुज़ार  सकते थे, नहीं गुजार  पाए.......  आज भी  मुझे  वह चेहरा याद आता है ,जब हम सब शाम को घर वापस आते थे तो माँ की वह ख़ुशी। वो ख़ुशी  हम उन्हें हमेशा दे सकते थे।

आज भी न जाने कितने लोग यह गलती कर  रहे हैं , अपनों के लिए अपने से ही दूर  जा रहे हैं , अपनी आकांक्षाय , इच्छाए  को कम करके थोड़ा सुकून  ले, ज़िदगी सिर्फ दौड़ने का नाम नहीं हैं , कभी कभी बैठकर महसूस करने का नाम भी ज़िनदगी है  , उनके साथ समय बिताये , जो आपके अपने हैं, क्योंकि ज़िन्दगी दुबारा मौका नहीं देती। 

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