उसका यूं रूठ कर जाना मुझ से..
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|   May 24, 2017
उसका यूं रूठ कर जाना मुझ से..

प्रतिभा ज्योति

तांगे वाले की मदद से मां को तांगे में बमुश्किल चढ़ाया और खुद भी मां को सहारा देते हुए उसके पास ही बैठ गई कि तांगेवाले ने छड़ी को हवा में लहराया और उसकी आवाज़ के साथ वो मरियल सा घोड़ा चल पड़ा. मस्जिद से दस कदम आगे वाली संकरी सी गली में घर जाने के लिए. अलीगढ़ के सरकारी जिला अस्पताल से आज मां को छुट्टी मिल गई थी. डाक्टर तो सवेरे ही छुट्टी के लिए कह कर चले गए, लेकिन सब रिपोर्ट बनने, दवा लेने और उसे नर्स से समझने और फिर पर्ची पर अगली तारीख लिखवाने में दिन के चार बज गए थे.

भूख भी लग रही थी, सवेरे से कुछ खाया नहीं था, लेकिन भूख से जितने चक्कर आ रहे थे उससे ज़्यादा उसके दिमाग में ना जाने क्यूं एक बात बार बार घूम रही थी कि मां मर क्यूं नहीं गई? उसने दिमाग को कई बार झटका दिया, लेकिन बात निकलने को तैयार नहीं कि मां मर क्यूं नहीं…. अजीब लग रहा था उसे. खुद पर गुस्सा भी आ रहा था. मां से बहुत प्यार करती है वह. अपनी जान से भी ज़्यादा. कभी-कभी उसे लगता कि मां ही तो उसकी ज़िंदगी है तो कभी  यह सोच कर सिहर जाती कि वह मां के साथ नहीं होगी तो…..

जब से होश संभाला तो मां की ही साया रहा सिर पर. कहने को एक बड़ा भाई भी है, लेकिन वह ज़िम्मेदारियों से दूर है. उसने कभी जाना ही नहीं भाई का प्यार क्या होता है? पिता का चेहरा उसे याद भी नहीं. मां ने एक छोटी सी प्राइवेट कंपनी में काम करके दोनों बच्चों को पाला था. अलीगढ़ में ज़्यादातर छोटे कारखानों में पीतल की चीजें बनाने का काम होता है, उसे कारीगरी तो नहीं आती थी लेकिन वह पीतल की चीज़ों को अपने हाथों से एक नई चमक देने में माहिर थी.

 

पीतल के कारखाने में उड़ती गर्द से मां का शरीर बीमार रहने लगा और वह बुढ़ापा आते-आते अक्सर बीमार रहने लगी. गर्द ने उसके फेफड़ों में कब्ज़ा जमा लिया था. अब उससे घर का काम नहीं होता तो आस–पड़ोस के लोग भाई की शादी के लिए दबाव डालने लगे. भाई को बी कॉम करने के बाद नौकरी मिल गई लेकिन वह घर में पैसा नहीं देता और ना ही कोई मदद करता. किसी तरह अपनी जमा पूंजी से मां ने भाई की शादी कर दी मेरी पढ़ाई अभी चल ही रही थी बीए का आखिरी साल..

भाभी अच्छी थी, पढ़ी लिखी और सरकारी स्कूल में टीचर , लेकिन आई ने उसका ट्रांसफर मुरादाबाद करवा दिया और साथ लेकर चला गया. वहां उसे दूसरी कंपनी में मैनेजर की नौकरी मिल गई. अब उस छोटे से घर में हम दो ही रह गए मैं और मां. बीमारी की वजह से जब मां को नौकरी छोड़नी पड़ी तो मैंनें एक छोटी नौकरी तलाश ली और साथ में कुछ ट्यूशन कर ली. बस यूं कह लीजिए कि गुज़ारा भर चलता था.

मां को हर महीने दो महीने में अस्पताल में भर्ती कराना पड़ता. सरकारी अस्पताल में पैसा नहीं लगता लेकिन दवा पानी का ही खर्च काफी हो जाता और फिर टेस्ट के पैसे भी लगते, क्योंकि सरकारी अस्पताल की मशीनें या तो काम नहीं करती या फिर किसी बड़े आदमी के कहने सुनने पर ही टेस्ट हो पाते. हमारा नंबर ही नहीं आता. हर बार जब मां को छुट्टी मिलती तो मैं बहुत खुश होती. राहत की सांस लेती और घर पहुंच कर मां को उनकी पसंद का बना कर कुछ खिलाती. 

मां से ही तो रौनक थी मेरे चेहरे पर, लेकिन हर बार उनके अस्पताल में भर्ती रहने से काम से छुट्टी लेनी पड़ती तो अगले महीने आधी अधूरी तनख्वाह मिलती लिहाजा मुश्किलें बढ़ने लगी थी. मां की बीमारी से कर्जा बढ़ने लगा. रिश्तेदार और पड़ोसी जब भी घर आते तो मां पर मेरी शादी का दबाव डालते, लेकिन मैंने साफ इंकार कर दिया, वैसे भी मुमकिन नहीं था और अब तो कर्जदार तकाजा तो करते ही थे, कर्ज मिलना भी मुश्किल हो गया था. भाई ने तो शहर छोड़ने के बाद दोबारा पूछा ही नहीं , लेकिन हर बार जब मां को अस्पताल से छुट्टी मिलती और मां को तांगे पर बिठाती तो मेरी सारी थकान और परेशानियां ख़त्म हो जातीं.

मां को सहारा देकर ठीक से बिठाया. मां को छुट्टी तो मिल गई थी, लेकिन लग रहा था कि उन्हें जल्दी फिर अस्पताल लाना पड़ेगा. यानि इस बार नौकरी पर रखेगा ही नहीं वो, कर्जा सिर पर और चढ़ जाएगा. आज कल तो खाने की लिए भी तंगी होने लगी थी क्योंकि दवाओं का खर्च बढ़ता जा रहा था. सोचते- सोचते पता ही नहीं चला कि तांगे वाले ने आवाज़ दी बहन जी पहुंच गए हैं, उतरिए..

घर के दरवाजे के बाहर लेटा मरियल कुत्ता उठ कर चला गया. दरवाजे की कुंडी खोली तो वह टूट कर लटक गई यानि इस बार अस्पताल जाने से पहले उसे भी ठीक कराना होगा, लेकिन अस्पताल जाने से भी क्या होगा मां ठीक होगी पूरी तरह? सवाल के साथ ही दिमाग फिर वहीं पहुंचने वाला था कि मैंने सिर झटका और मां को खाट पर लिटा दिया. मटके से ग्लास में पानी भरा मां को पिलाने के लिए. मां को आवाज़ दी तो लगा कि शायद उसने सुना नहीं. मैंने हाथ लगा कर उठाने की कोशिश की तो मां का सिर एक तरफ लटक गया ..

अब सवाल की ज़रुरत नहीं रह गई थी, क्या मां ने सुन लिया था मेरे मन का सवाल..

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