बचपन की राखी....
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|   Aug 04, 2017
बचपन की राखी....

रक्षाबंधन का त्यौहार नज़दीक ही था की भैया से बात करते करते दिल भर आया जब उन्होंने फ़ोन पर कहा " इस रक्षाबंधन पर दामादजी और बच्चों के साथ हैदराबाद आजा , कितने साल हो गए हमने साथ में राखी का त्यौहार नहीं मनाया " अपनी भावनाओं को धीरज में रख कर मैंने कहा   "भैया इस बार तो संभव नहीं हो पाएगा क्यूंकि इनको छुट्टियां नहीं है और बच्चों की परीक्षा भी नज़दीक आरही है" ऐसा कहते ही मैंने बात बना कर भैया से फ़ोन रखने को कहा की दरवाज़े पर शायद कोई है। लेकिन दरवाज़े पर कोई नहीं था लेकिन मेरी आँखों के दरवाज़े में ज़रूर आंसु भर आए थे क्यूंकि हर साल की तरह  इस साल भी मैंने भैया से अगली बार आने की कोशिश की उम्मीद जगाई थी जो की वह भी नहीं जानते थे की यह उम्मीद कब पूरी होगी।लेकिन मेरी आँखों के आंसू शायद बहुत ही अनमोल थे क्यूंकि उनसे मुझे अपने बचपन की राखी याद आगयी।

उस बचपन के रक्षाबंधन की याद आगयी जो हम सब साथ में मिलकर मनाया करते थे , जहाँ कोई ज़िम्मेदारी नहीं थी, कोई मजबूरियाँ नहीं थी, ज़िन्दगी इतनी व्यस्त नहीं थी सिर्फ सुनहरे पलों का संसार था जो शायद अब कभी वापस नहीं आपाएगा। हमारा परिवार बहुत बड़ा था जिसमे पापा और उनके चारों भाई और भाभियां थी यानि हम बच्चों के ताउजी-ताईजी,चाचा-चाची थे , बुआ-फूफाजी और हमारे परिवार की नींव हमारे बाबा अम्मा भी उस समय हमारे बीच थे। यूं तो सब अपनी नौकरियों की वजह से अलग अलग रहते थे लेकिन हर त्यौहार पर सब एक जगह इकठ्टे हो जाते थे जहाँ भी बाबा अम्मा होते थे। इसीलिए बचपन में हम को हर त्यौहार का बेसब्री से इंतज़ार रहता था क्यूंकि हर त्यौहार पर अलग अलग जगह जाने का अवसर मिलता था। उस समय न रिजर्वेशन का टेंशन था, जनरल में ही जा रहे है सब।बिना ये सोचे  की ट्रैन में जगह मिलेगी भी या नहीं फिर भी मम्मी सफर के लिए पूडियां,आलु की सब्जी बनाती थीं और जैसे ही हम लोगों को रेलगाडी में जगह मिलती थी वैसे ही हम भाई बहन लड़ते थे की खिड़की वाली सीट पर कौन बैठेगा। एक अलग ही मज़ा रहता था । जैसे ही सब एक साथ होते थे तो घर में जैसे रौनक सी लगने लगती थी मानो की बिना दिवाली के ही घर जगमग जगमग हो रहा ह। पूरा घर हम सब चाचा ताऊ के बच्चों से गूंज उठता था। बाबा अम्मा का चेहरा तो जैसे खिल उठता था जब रक्षाबंधन पर बुआ भी आजाती थीं अपने बच्चों के साथ्। बाबा अम्मा तो जैसे हम बच्चों में ही बच्चे बन जाते थे और हमें छोटी छोटी टॉफियां देते थे जिनका अपना ही मीठा सा प्यार भरा स्वाद होता था। रात होते ही हम सब भाई बहन एक साथ सोते थे लेकिन नींद किसी को नहीं आती थी, सबको रक्षाबंधन की सुबह का इंतज़ार रहता था।

सुबह होते ही सब नहा धो कर जल्दी तैयार हो जाते थे और सब भाई अपनी अपनी राखियां पसंद करते थे मुझे ये वाली बाँधना, मुझे ये वाली। उस समय कार्टून वाली राखियां,लाईट वाली महंगी राखियां तो नहीं होती थी लेकिन फिर भी उन छोटी छोटी सादगी भरी राखियां में भी एक प्यार और अपनापन सा झलक था । वही राखियां दुनिया की सबसे सुंदर राखियां लगती थी।          उस पुराने समय में काम बहुत थे , लोग भी बहुत थे, इतनी कामवाली बाइयाँ आजकल के जैसे नहीं थी लेकिन फिर भी घर की सभी ताईजी चाची मिलकर बातें करते करते किचन के सभी काम फटाफट निपटा देती थीं।।शायद वह काम उन्हें काम नहीं लगता थे क्यूंकि उन सभी के मन में एक उत्साह सा रहता था। उन सभी की आँखों में चमक रहती थी ,होंटों पर मुस्कराहट रहती थी और सबसे बड़ी बात इतना काम करके भी उ���के सर से पल्ला नहीं हटता था लेकिन उनके सभी के चेहरों पर कोई शिकन नहीं होती थी। बातें तो जैसे उनकी ख़तम ही नहीं होती थीं क्यूंकि तब न उनलोगो के वाट्स अप्प ग्रुप थे और न कोई मोबाइल फोन।

सब ताऊजी-ताईजी ,चाचा-चाची बड़े उत्साह से बुआ से राखी बंधवाने को बैठते और उनके चेहरे पर एक अलग ही प्यार भरी मुस्कान बुआ के लिए होती थी और बुआ भी बड़े मन से राखी बांध ने को उत्सुक रहती थीं। फिर उसके बाद हम बच्चों की बारी आती थी । सभी बहनें बारी बारी से आकर सभी भाइयों को राखी बांधती थी और भाई कहते थे मुझे ये वाली बांध, तू मुझे ये वाली मिठाई खिला फिर दूसरी बहन आकर दूसरी मिठाई खिलाएगी। उस समय फाइव स्टार ,डेरी मिल्क न होते हुए भी ज़ादा खुशी भाइयों को सोहन पापडी, काजू कतली से ज़ादा खुशी मिलती थी। 

 फिर बारी आती थी हम लोगों के पैसे गिनने की। आजकल जितने ज़ादा पैसे तो नहीं होते थे पर उन कम पैसों में भी हमारी इच्छाऐं बहुत रहती थीं और खुशी का तो ठिकाना ही नहीं होता था। हम सारी  बहनें बड़ी रूचि से अपने पैसे गिनते थे फिर अम्मा बोलती थी "बेटा ये पैसे अपनी मम्मी को रखवा दो वरना घूम जाऐंगे।"

राखी का कार्यक्रम होते ही सब अपनी बातों में, खाने पीने में लग जाते थे। घर के सभी जेंट्स अपनी बातें करते थे, उधर घर की सारी लेडीज अपनी बातें कर रही होती थी लेकिन दोपहर में कोई नहीं सोता था जैसे की किसी को कोई थकान हुई ही हो।

हम बच्चे लोग और बाबा अम्मा सब एक कमरे में होते थे और खूब मज़े करते थे। शायद उस समय टैब्लेट्स, कार्टून चैनल,मेहेंगे मेहेंगे गेम्स, ये सब नहीं होते हुए भी जो मज़ा हम लोगो को मिलकर कैरम, किकेत, गुल्ली-डंडा, खेलने में जो मज़ा आता था वह मज़ा आजकल के बच्चों को भी शायद नहीं  आता होगा।ऐसे ही करते करत,ह्स्ते बोलते हुए वापस अपने अपने घर जाने का समय आजाता था लेकिन मन नहीं भरता था और अगले त्यौहार पर मिलने का प्रोग्राम भी बन जाता था।

सोचते सोचते आंखें भर आई और देखा टेबल पर रखी हुई चाय भी ठंडी हो चुकी थी। उस चाय की तरह मन को लगा कि ज़िन्दगी भी कुछ इसी तरह ठंडी सी हो गई है। कहने को आज सबके पास सब कुछ है,कुछ कमी नहीं है लेकिन अगर कमी है तो वक़्त की ।

आज हम लोग अपनी ज़िन्दगी की दौड़ में इतने व्यस्त हो चुके हैैं की आज कोई भी त्यौहार का कोई उत्साह शायद ख़तम ही होगा गया है, शायद आने वाली पीढ़ी भी ऐसे पलों का आनंद कभी नहीं ले पाएगी। शायद वक़्त की यही मांग है।अंत में मुझे जगजीत सिंह जी की मशहूर ग़ज़ल की  सुंदर पंक्तियां याद आ रही हैं-

"ये दौलत भी ले लो ये शोहरत भी ले लो।।। भले छीन लो मुझसे मेरी जवानी मगर मुझको लौटा दो बचपन का सावन, वो कागज़ की कश्ति, वो बारिश का पानी।" 

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