पिया की पहरेदार - बिखरता बचपन या पैसों का बाज़ार...???
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|   Jul 22, 2017
पिया की पहरेदार - बिखरता बचपन या पैसों का बाज़ार...???

पहरेदार पिया की....??..क्या सच में..??

कुछ अलग कुछ नया करने के चक्कर में क्या हो गया है इन T.V serial producers को?..पिछले कुछ दिनों से इस show का प्रचार खूब ज़ोरों- शोरों से किया जा रहा था । कुछ लोग शायद उत्सुक भी होंगे इसे देखने के लिए, शायद मनोरंजन के तौर पर , पर उत्सुक होने के बजाय यह हम सबके लिए एक चिंता का विषय है । मैं तो इस show का पूरी तरीके से बहिष्कार करती हूँ  । क्योंकि किसी भी हालत में, चाहे कोई भी situation plot की गई हो, यह शादी कैसे हो सकती है?...एक 9 साल के बच्चे की शादी एक युवा लड़की से?...क्योंकि कुछ नया दिखाना था? TRP बढ़ानी है show की?..बच्चे की security चाहिए थी तो legal guardian बना देते, बड़ी बहन बना देते, लेकिन - पत्नी....???

हम अपने घरों में बच्चों को जहाँ नैतिक शिक्षा और नैतिक मूल्यों की समझ दे रहें हैं, वहीं TV shows इनको यह सारी फालतू सामाजिक शिक्षा दे रहे हैं जहां एक 9 साल का बच्चा... जी हाँ मात्र 9 साल का बच्चा एक युवती का पीछा करता है और उसका दुपट्टा पकड़ कर उससे पूछता है- " क्या तुम मुझसे शादी करोगी...??" 

ऐसा क्यों है कि ,क्या हमारी यह सामाजिक ज़िम्मेदारी नहीं है कि हम समाज को बेहतर बनाने की कोशिश करें..!!..क्या commercialization के नाम पर कुछ भी TV पर प्रसारित किया जाएगा..? कुछ नई कहानी दिखानी है तो , किसानों की जीवन से जंग को साकार रूप दो, भूकंप पीड़ितों का दर्द समाज से सांझा करो, कितनी ही ऐसी अनकही कहानियां है जो commercial hit हो सकती हैं, लेकिन ऐसे बच्चों को गलत राह दिखाना कहाँ तक उचित है..??

इस बच्चे को hero के तौर पर दिखाया गया है, और hero को तो हमारे यहां बिना कुछ सोचे -समझे सब Follow करते हैं, तो बच्चों की नजरों से इसे कैसे दूर करेंगे ?TV जनता तक पहुँचने का एक बहुत ही बड़ा और शक्तिशाली माध्यम है जिसकी पहुंच का हम और  आप अंदाज़ा भी नहीं लगा सकते । हर अच्छी - बुरी खबर निः संदेह अपना असर छोड़ जाती है तो क्यों ना हम सिर्फ अच्छी बातें दिखाएँ, एक सुंदर भारत के निर्माण में अहम भूमिका निभाएँ..!! 

बच्चों के बचपन पर सिर्फ उनका हक़ है, बच्चों को बचपन मे ही इतना बड़ा कर देंगे तो बड़े होकर वो क्या करेंगे... सोच सकते हैं आप..!  TV जगत के आकर्षण से बच्चा या बड़ा कोई अछूता नहीं है तो जानते - बूझते क्यों बच्चों को बहकने का एक और मौका देना?.. हम  teenagers की psychology से अनभिज्ञ तो नहीं, उनकी बात और व्यवहार समझना और समझना कितना मुश्किल है, और उसके ऊपर से पहरेदारी का यह नया तरीक़ा हम parents की मुसीबत और बढ़ा ही देगा।

आप चाहे इसे जो कह लीजिए, विनम्र प्रार्थना या एक सच्ची कोशिश, लेकिन आप सबसे मेरा यही अनुरोध है कि बच्चों से उनका बचपना मत अलग कीजिये, वो भी एक दिन बड़े हो ही जायेंगे । इस या इस जैसे किसी भी Show, जहां आपको लगे कि बच्चों की मासूमियत और उनकी समझ से खिलवाड़ किया जा रहा है, उसे मत देखिये और जिस किसी भी व्यक्ति को समझा कर मना कर सकते हैं, please कीजिए । समाज का हिस्सा हम सब हैं तो फ़र्ज़ भी हम सबका बनता है,यह किसी एक की ज़िम्मेदारी नहीं, हम सबकी जवाबदारी है ।

Media से जुड़े सब लोग ऊंची शिक्षा के धनी हैं, सजग व्यक्तित्व के धनी हैं, आपसे हमे हमेशा ही अच्छी बातें (कुछ को छोड़कर)  सीखने को मिलती रहीं हैं । आपका एक बेहतर समाज बनाने में बहुत बड़ा योगदान है । लोग आप पर हर तरह से भरोसा करते हैं तो इस तथ्य के मद्द��� नज़र आपका फ़र्ज़ बनता है कि जहां तक हो सके TV पर नैतिक मूल्यों तथा नैतिक कर्तव्यों का संचार करें और हमारी आने वाली पीढ़ी में उच्च व्यवहार तथा उसूलों का सृजन कर उन्हें इस भारत को और आगे ले जाने के योग्य बना सकें ।

धन्यवाद..!!

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